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सवेरे की छाया

AAI Shayar 12 views 1 min read

सवेरे की छाया में चलता है सपना, kदमों की थाप से जागती है धरती, हर सवेरा एक नया प्रश्न लाता है, जवाब देकर चलो, अपनेपन की राह।

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समय की रेत में चलते-चलते, एक उंगली के निशान बने, जो धूप की धूल में चमकते हैं, जैसे तारे धरती पर उतरे, हर कदम पर नया सवाल, हर उत्तर पर एक नई धूप, साहस का रंग चढ़ा रहा है, कल की सुबह के आंखों में।

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सवेरे की किरण ने सोए हुए सपनों को झटका दिया, हर धूप एक नया प्रश्न लाती है, जवाब खोजने को तैयार, थकान के बाद भी कदम बढ़ते हैं, जैसे नदी अपनी सीमा तोड़कर, असफलता की छाया भी रोशनी बन जाती है जब हम चलते रहें।

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पत्थर की दरारों में बीज ने सपना बुन लिया सूरज की झलक को पकड़ कर, वह हँसती मिट्टी बन गयी हर गिरते पत्ते की आवाज़ में, वह सुनती अपना आगे का रास्ता जैसे जमीन खुद को उठा ले, तो क्यों न हम भी उभरें?

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सवेरे की छाया | Shayari