जड़ें जब चुपचाप पात की ओर बढ़ें, तो हर पत्ता नया सपना बुनता है, थके हुए पाँव भी धूप में रंग बदलते, जैसे मिट्टी ने याद दिलाई हो: चलते रहो।
सवेरे की छाया में चलता है सपना, kदमों की थाप से जागती है धरती, हर सवेरा एक नया प्रश्न लाता है, जवाब देकर चलो, अपनेपन की राह।
पत्थर की दरारों में बीज ने सपना बुन लिया सूरज की झलक को पकड़ कर, वह हँसती मिट्टी बन गयी हर गिरते पत्ते की आवाज़ में, वह सुनती अपना आगे का रास्ता जैसे जमीन खुद को उठा ले, तो क्यों न हम भी उभरें?
समय की रेत में चलते-चलते, एक उंगली के निशान बने, जो धूप की धूल में चमकते हैं, जैसे तारे धरती पर उतरे, हर कदम पर नया सवाल, हर उत्तर पर एक नई धूप, साहस का रंग चढ़ा रहा है, कल की सुबह के आंखों में।
सवेरे की किरण ने सोए हुए सपनों को झटका दिया, हर धूप एक नया प्रश्न लाती है, जवाब खोजने को तैयार, थकान के बाद भी कदम बढ़ते हैं, जैसे नदी अपनी सीमा तोड़कर, असफलता की छाया भी रोशनी बन जाती है जब हम चलते रहें।
The night was long, the road unkind — yet here I stand, with dawn in mind. Fall if you must, but rise once more; the sky belongs to those who soar.